मल्लिकार्जुन मंदिर श्रीशैलम

Mallikarjuna Temple, Srisailam

महाकालेश्वर मंदिर, उज्जैन की अस्थापना के बारे में कई प्राचीन पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। हालांकि, यह स्पष्ट रूप से नहीं ज्ञात है कि मंदिर की अस्थापना किसने और कब की गई। इसके पीछे कई ऐतिहासिक और धार्मिक कारण हो सकते हैं जिन्हें निर्धारित करना मुश्किल है।

महाकालेश्वर मंदिर, उज्जैन एक प्राचीन मंदिर है जिसे विभिन्न समयों में सुधार किया गया है और नवीनीकृत किया गया है। मंदिर का महत्व अद्वितीय है और यह भगवान शिव को समर्पित है। मंदिर के विभिन्न हिस्सों में अनेक प्राचीन मूर्तियां, मंडप, और समर्पित स्थल हैं जो इसकी महिमा को बढ़ाते हैं।

अत्यंत संभावना है कि महाकालेश्वर मंदिर की अस्थापना कई सैकड़ों वर्षों पहले हुई होगी, जब उज्जैन क्षेत्र में शिव पूजा की परंपरा थी। यह उत्सवी और महत्त्वपूर्ण स्थान है जिसे विश्वभर के शिव भक्तों द्वारा प्रसन्नता और श्रद्धा से यात्रा किया जाता है।

मल्लिकार्जुन मंदिर में पूजा और आरती किस तरह और कब की जाती है

मल्लिकार्जुन मंदिर में पूजा और आरती नियमित रूप से की जाती है। यहां दैनिक पूजा, श्रृंगार और आरती क्रम संपादित किया जाता है।

प्रतिदिन की पूजा में सुबह को श्री शैलेश्वर स्वामी की अभिषेक पूजा की जाती है, जिसमें तिलक और विभूति लगाई जाती है। इसके बाद मंदिर में भगवान शिव की पूजा की जाती है, जिसमें फल, फूल, धूप, दीप, नैवेद्य और भजन का आयोजन होता है। इसके बाद दोपहर को फिर से पूजा की जाती है।

आरती का आयोजन प्रतिदिन शाम को होता है। शाम की आरती के दौरान, पुष्पांजलि, दीप, आरतीका थाली, मंगलाचरण गाने जाते हैं और भक्त आरती के वक्त श्लोक और भजन गाते हैं। आरती के बाद, आरती का प्रसाद भक्तों को वितरित किया जाता है।

मल्लिकार्जुन मंदिर में विशेष आरतियाँ भी मनाई जाती हैं, जैसे सोमवार को श्री शैलेश्वर स्वामी की आरती, शुक्रवार को राजराजेश्वरी माता की आरती और शनिवार को हनुमान जी की आरती।

इस प्रकार, मल्लिकार्जुन मंदिर में नियमित रूप से पूजा और आरती की जाती है ताकि भक्त भगवान के दर्शन और सेवा का आनंद ले सकें

मलिकार्जुन ज्योर्तिलिंग का पौराणिक कथा

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग का पौराणिक कथा निम्नलिखित है: कहा जाता है कि एक समय परमेश्वर शिव और पार्वती महाशक्ति में खेल रहे थे। उनका खेल देखकर देवताओं ने उनसे पूछा कि उन्हें इन खेलों का मतलब क्या है। शिव ने उन्हें बताया कि उनके खेलों का मतलब सृष्टि, स्थिति और संहार है, जिससे सृष्टि की नियमितता और सुनिश्चितता बनी रहती है। तभी एक साधु प्रगट हुए और पूछा कि उन्हें भी इन खेलों के बारे में बताएँ। शिव और पार्वती ने साधु को बताया कि उनका खेल सृष्टि की रचना और संचालन में सदैव चल रहा है और यह सब जगह प्रकट होता है। साधु ने कहा कि वह इसे स्थायी रूप से देखना चाहता है। शिव और पार्वती ने उन्हें एक ज्योतिर्लिंग दिखाया जिसे मल्लिकार्जुन नाम दिया गया। मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग भगवान शिव का एक अद्वितीय रूप था, जो अनन्य प्रेम, सामर्थ्य और धर्म का प्रतीक है। मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग का विशेषता से अनुसरण करने से, साधु ने अपनी आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति की और संसार के भक्तों को इस ज्योतिर्लिंग की पूजा करने की सलाह दी। इसके बाद से मल्लिकार्जुन मंदिर में भगवान मल्लिकार्जुन की पूजा की जाती है और वहां आने वाले भक्तों को आध्यात्मिक संतोष की प्राप्ति होती है।

मल्लिकार्जुन मंदिर में तमिल संतो ने स्तुति क्यों गयी जाती है

मल्लिकार्जुन मंदिर में तमिल संतों की स्तुति गायी जाती है क्योंकि वे मंदिर की महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं और उन्होंने इस मंदिर को आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्त्व प्रदान किया है।

तमिल संतों में प्रमुख थे नायनमार्तंद और उनके शिष्य तिरुनावुक्करसु नायनार जो मल्लिकार्जुन मंदिर के शिव जी की स्तुति करने के लिए अपनी कविताएँ लिखते थे। इन तमिल संतों की कविताएँ प्रशंसापूर्ण होती थीं और उन्होंने मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के महत्व को व्याख्यान किया था।

तमिल संतों की स्तुति मल्लिकार्जुन मंदिर में गायी जाती है ताकि उनके योगदान का सम्मान किया जा सके और भक्तों को उनकी आध्यात्मिकता और भक्ति की प्रेरणा मिल सके। तमिल संतों की कविताएँ मंदिर के आस्थानिक माहौल में एक अद्वितीयता और सौंदर्य का अनुभव कराती हैं।

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