नागनाथ मंदिर नागेश्वर

Nagnath Mandir Nageshwar

नागेश्वर मंदिर, जिसे नागनाथ मंदिर भी कहा जाता है, उत्तराखंड राज्य के पिथौरागढ़ जिले में स्थित है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है, और विशेष रूप से उनके नाग रूप (साँप के रूप) के रूप में पूजा जाता है। यह मंदिर नागेश्वर धाम के रूप में भी जाना जाता है, जो शिव पुराण में वर्णित है।

नागेश्वर मंदिर का इतिहास बहुत प्राचीन है और इसे पुराणों में विस्तृत रूप से उल्लेख किया गया है। मान्यता है कि यह मंदिर नाग राज वासुकी के निवास स्थान पर स्थित है, जिसने अपने तपस्या के दौरान भगवान शिव का ध्यान किया था।

नागेश्वर मंदिर की संरचना हिमालयी वास्तुशास्त्र के अनुसार बनाई गई है। यह मंदिर पत्थरों से निर्मित है और अपनी शिल्पकारी और संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर के गर्भगृह में नागेश्वर शिवलिंग स्थापित है, जिसे पूजा जाता है। मंदिर के आसपास बहुत सारी नाग मूर्तियां और प्रतिमाएं स्थापित हैं, जो शिव के नाग रूप को प्रतिष्ठित करती हैं।

नागेश्वर मंदिर का एक अद्वितीय और प्रसिद्ध संबंध यह है कि यह मंदिर नाग पंचमी त्योहार के दिनों में बहुत भाग्यशाली माना जाता है। हर साल नाग पंचमी के दिन यहां बहुत संख्या में भक्त आते हैं और शिव के नाग रूप की पूजा करते हैं। इस दिन पर्यटक और श्रद्धालुओं के बीच धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों का आयोजन होता है।

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा के अनुसार, एक समय पर एक ऋषि नामक तपस्वी महात्मा हिमालय पर्वत के निकट एक गुफा में तपस्या कर रहे थे। उनकी पूरी ध्यानवान तपस्या ने देवताओं को प्रसन्न कर दिया और वे उनसे आशीर्वाद मांगने के लिए वहां पहुंचे।

देवताओं की उपस्थिति में ऋषि ने अपनी इच्छा व्यक्त की कि वे एक ऐसे स्थान का निर्माण करें, जहां भक्तों को उनकी मनोकामनाएं पूरी हो सकें और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हो सके। इस पर देवताओं ने ऋषि की प्रार्थना को स्वीकार करते हुए उन्हें वरदान दिया कि वे एक ऐसे स्थान को सृजन करेंगे, जिसे नागेश्वर ज्योतिर्लिंग कहा जाएगा।

इसके बाद देवताओं ने अपने शक्तिशाली वरदान के साथ वहां शिव की विशेष पूजा की और शिव को आग्रह किया कि वे वहां निवास करें और भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करें। इस प्रकार नागेश्वर ज्योतिर्लिंग का निर्माण हुआ और यहां भगवान शिव नाग रूप में प्रतिष्ठित हुए।

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के संबंध में एक और प्रसिद्ध कथा है। कथानक के अनुसार, दक्ष याज्ञ के समय माता सती के पिता राजा दक्ष ने महादेव (शिव) को न आमंत्रित किया था और अपमानित किया था। सती ने इसका दुःख झेलकर अपनी योगज्योति से अपने शरीर को दहलाया था। इसके बाद महादेव ने सती के शरीर के अंशों को विभाजित कर दिया और उनके अंशों के स्थान पर 52 ज्योतिर्लिंग स्थापित किए। नागेश्वर ज्योतिर्लिंग इनमे से एक है, जिसे सती के नाग (साँप) रूप का एक अंश माना जाता है।

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की कहानी

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग भारत में स्थित एक प्रमुख हिन्दू तीर्थस्थल है जो गुजरात राज्य के सौराष्ट्रा क्षेत्र में सोमनाथ मंदिर के पास स्थित है। यह ज्योतिर्लिंग महादेव के एक महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है। नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की कहानी पुराणों में वर्णित है। एक प्राचीन काल में, एक नाग नामक राजा वासुकि था जो भगवान शिव का एक भक्त था। वासुकि ने अपनी तपस्या और व्रत के बाद भगवान शिव से वरदान मांगा कि वह एक अदम्य और अमर शरीर प्राप्त करें। भगवान शिव प्रसन्न हो गए और उन्होंने वासुकि को वरदान दिया। यह वरदान प्राप्त करने के बाद, वासुकि शरीर में शक्तियों का विकास हुआ और वह अत्यधिक तेजस्वी हो गया। उसने अपने अद्भुत शक्तियों का उपयोग करके सागर को सूखा दिया और उसे नगरों को उजाड़ दिया। देवताओं और मानवों ने अपनी स्त्रियाँ, बच्चे और पशु-पक्षियों को संरक्षण के लिए भगवान विष्णु की शरण ली। उन्होंने भगवान विष्णु से सहायता मांगी और उन्होंने नाग वासुकि को समझाया कि वह सभी को छोड़कर शिव के पास जाकर क्षमा मांगें। नाग वासुकि ने विष्णु के सुझाव का पालन करते हुए नागेश्वर क्षेत्र में चले गए और वहां शिव की उपासना आरम्भ की। उन्होंने भगवान शिव को ब्रह्मास्त्र के द्वारा प्रार्थना की और शिव ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। इसके बाद से, वहां एक ज्योतिर्लिंग के रूप में नागेश्वर का दिव्य रूप स्थापित हुआ, जिसे भक्तगण श्रद्धा और भक्ति से पूजते हैं। नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की यात्रा मान्यता से प्रमुखता रखती है और इसे माघ महीने के शुक्ल पक्ष के प्रतिपदा तिथि को विशेष आंदोलन के रूप में मनाया जाता है। यात्रियों को अपने मनोकामनाओं की प्राप्ति के लिए इस ज्योतिर्लिंग का दर्शन करना परंपरागत रूप से माना जाता है।

स्कन्दपुराण के अनुसार नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा

काशीपुर नगर में राजा सुमेद का राज्य था। राजा सुमेद के अनुयायी, राजकुमार सुमन्त्र, बहुत ही निष्कपट और सत्यवादी व्यक्ति थे। वह भगवान शिव का बहुत बड़ा भक्त था और सभी लोगों को धर्म के पथ पर चलने की प्रेरणा देते थे।

एक दिन, राजा सुमेद के पुत्र राजकुमार सुमन्त्र को भगवान शिव के दर्शन करने का मन हुआ। उन्होंने अपने पिता से अनुमति लेकर उनकी अनुग्रह प्राप्त की और उन्होंने उनसे एक बहुत बड़ी यात्रा करने की इच्छा व्यक्त की।

राजकुमार सुमन्त्र ने एक उद्यान में एक विशाल मंदिर बनवाया जहां भगवान शिव की पूजा की जाती थी। एक दिन, जब सुमन्त्र मंदिर में अपनी पूजा कर रहे थे, उन्होंने देखा कि एक सर्प (नाग) मंदिर की सभी मूर्तियों पर बिल्कुल ठहर गया है। सुमन्त्र ने विचार किया कि इसका कारण कुछ विशेष हो सकता है।

उन्होंने तत्काल मान्यताओं की अध्ययन किया और जाना कि इस मंदिर में एक प्राचीन नाग राजा ने विचार किया कि यहीं पर उनका अंतिम स्थान होना चाहिए। वे समझते थे कि इस मंदिर का नाम “नागेश्वर” होना चाहिए।

सुमन्त्र ने तत्पश्चात उस नाग राजा की प्रार्थना की और भगवान शिव की कृपा से उन्होंने मंदिर की नींव स्थापित की। भगवान शिव ने सुमन्त्र को वरदान दिया कि वे इस नागेश्वर मंदिर की यात्रा का प्रचार करेंगे और उसकी महत्ता को लोगों को बताएंगे।

इस प्रकार, नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा स्कन्दपुराण में वर्णित है। यहां भगवान शिव की कृपा से एक नाग राजा की प्रार्थना स्थान मिला और यहां पर उनकी पूजा आदि की जाती है। नागेश्वर ज्योतिर्लिंग को माघ मास के शुक्ल पक्ष के प्रतिपदा तिथि पर विशेष महत्व प्राप्त होता है।

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